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प्रेम में आपको उसका संग तो चाहिए पर संगत की जरूरत नहीं।

प्रेम में आपको उसका संग तो चाहिए पर संगत की जरूरत नहीं। आप अपने अंदर अपनी संगत खुद गढ़ लेते हैं।अपने भीतर प्रेम का स्रोत आपका अपना है। निर्भरता तो है पर इसे अपनी आत्मा में ही रखा जाना चाहिए। आना -जाना मिलना - मिलाना भूल कर बस "हो जाना" याद रखा जाना चाहिए। आप प्रेम के अपने सम्राट- साम्राज्ञी रहिये भीतर ही भीतर। दो नहीं इक अपनी झूम का नाम है प्रेम। इसे अपने भीतर ही अर्जित किया जा सकता है। *तुम जो मिल गए ....मेरा साया मिल गया💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें