कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2679

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तू कुछ भी होकर देख ले

*तू कुछ भी होकर देख ले ... मुझसा साया न पायेगा। कुछ नहीं चाहती ... बस ये कि एक रोज़ ... समंदर किनारे से एक रंगीन सीप समझ कर मुट्ठी भींच लो। रेत पर चलते हुए एक दबी हरी पत्ती समझ कर जेब में रख लो। पहाड़ों पर आओ कभी तो धुँध समझ कर साँसों में भर लो । उस windchime की घण्टियों में मेरी दस्तक गिनते रहो। उड़ते बादल देखो तो धीरे से पूछो ....बरसोगी न कल्पना ? सूखे पेड़ को निहारो तो मन में मेरा इंतज़ार पनप आये। मेरे शहर आओ तो हर चेहरे पर मेरी आँखें उकेर दो चाहनायें हैं....लिखी हुई रूमानी लगती हैं और कुछ नहीं। *शामें ख़ाली रहती हैं तो याद से भर देती हूँ। शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें