कल्पनाशब्दों के बीच
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पाक बातें

पाक बातें.... कोई हमारे बारे में कुछ भी कहे सोचे हम सब जानते हैं हमारे आटे में कितना नमक है और कितना पानी । कोई क्यूँ तय करे कि आज हम पकेंगे या घोल कर पिए जाएंगे। हो सकता है हमारा आज पापड़ होने का मन हो या दानेदार हलवा ।किसी के कहने से ऐवें ही उपमा हो जाएं। तुम्हारे हिसाब की छोलिया रोटी क्यों बने कि तुमको पसंद है हमारा गरम तवे पर चिस जाना? हम मीठे शक्करपारे हैं आज ।वही रहेंगे दिन भर। इतनी आज़ादी तो होनी ही चाहिए कि मेन्यू और ब्रांड न भी बदल सके तो मालपुए को परांठे पूरी में भर कर खा सकें और कोई घूरे भी ना। कब तब आप ब्रेड की कतरनों सा हमें काटकर अलग करते रहोगे। घप्प करके खा जाएंगे आटे के लड्डू की तरह ...पंगे न ही लो। अभी हमें केक पिज़्ज़ा की हूक है तो क्यूं हम दलिया पर टिकें सिर्फ़ इसलिए कि ज़माना प्रवचन से चलता है। सुनो सुनो... आप चाह कर भी रोटी हमसे गोल नहीं बनवा सकते अगर हमें दुनिया चौकोर और दुनियादारी तिकोनी नुकीली लगती है। हम लच्छे ही खिलाएंगे तुमको।प्यार आ गया तो फुग्गा कर भटूरे। हो सकता है तुम दाल भात खाते हो तो हम तुम्हारी बची दाल में अपने सलोने गोल गोल बाटी क्यूं मिलाए। क्यूं कहें कि हमारा चूरमा तुम्हारी वाली बासी दाल से कम है? दिल के बदले दिल देंगे ज्ञान के बदले मुस्कान बात और लात rhyming हैं । जो दोगे वही लोगे। ये godgifted है।मेहनत नहीं लगती चूल्हा उधर है सोच इधर... उधर और ...उधर भी झोंक लो क्या करें मन नहीं जलता पर धुंआ दूर दिखता है। मगन रहो। *छुट्टी है .... मेरी बकवास कौन सुनेगा 😊😊😊 इस लिए लिख दिया । चाहो तो पक लो। माँ की फ़ोटो इस लिए लगाई कि पकाना खिलाना और बताना सब उसने सिखाया है।💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें