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मैं हमेशा कहती हूँ

मैं हमेशा कहती हूँ... *तस्वीर बनाने से नहीं बनती... देखने भर से बनती है। *देखते देखते ....तस्वीर बनती जाती है। * कभी तस्वीर देखते ही.... बन जाती है। *बन जाने के बाद ....तस्वीर देखी जाती है। *बनी हुई तस्वीर में देखना कम रह जाता है..... सिर्फ देख रह जाती है। *तस्वीर से किसी की देख बन जाना ....प्रेम है। *बनती तस्वीर में ....देखना ही देखना है। *देख कर कोई तस्वीर .... तस्वीर बने रहना भी बड़ी गहरी देख है। *बनकर तस्वीर आप देखते हो... देखते रहो तो आप बन जाते हो। *तस्वीर बन जाना होते जाना है.... वैसे देखते जाना भी तस्वीर में होते जाना है। *तस्वीर अगर देखना भूल जाए तो आप कहाँ बनोगे? *क्या बने देखने के लिए आईना नहीं तस्वीर ढूंढिए।आपकी देख उसमें सिलसिलेवार दर्ज़ है। *हर पंक्ति अलग है ....तस्वीर की तरह ....बने रहिये।😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें