भाषा / Language
सदाबहार खामोशियों के दरख़्त से कविता झड़ती रहती है.....हर मौसम
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*सदाबहार खामोशियों के दरख़्त से कविता झड़ती रहती है.....हर मौसम
*तुम्हारी रिक्तता लिखी नहीं जा सकती ....
वो बस है मुझमें सदाबहार
*दरारों से ज़िन्दगी उठा कर देखी है कभी?
मैं रोज़ अपना प्रेम उठा कर दुआ में रख रही हूँ....
बरसों से
*तुम्हारा नाम कुछ भी हो ....
मैं तुम्हें साया ही कहूँगी।
तुम मुझे अकेला होने कब देते हो?
*मैं पिछले पन्ने याद नहीं रखती
आगे आने वालों का हिसाब नहीं रखती .....
तुम मेरे लिए हमेशा "अब" हो।
*चलोगे मेरे साथ ?
परछाई पर परछाई धर कर
एक रोज़ ...
*तुम्हें खुद में रख कर भूल गयी थी एक रोज़.....
अब तुम कल्पना हो गए हो मुझमें ।
शुभरात💐💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें