कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2302

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जिंदगी टुकड़ों में ही मिलती है

*जिंदगी टुकड़ों में ही मिलती है.... अपने लिए पूरा चाँद हमें खुद ही बनाना पड़ता है। *अगर मैं कहूँ ... वो दूर से मुझे ज़िंदा रखता है। मान लोगे क्या? *फिर एक रोज़ हम खोना पाना भूल गए। होना सीख लिया। हम हैं अब... *सलीका तो मिल जाता है .... बस ....उस सरीखा ही नहीं मिलता। शुभरात💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें