कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2303

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कुछ प्रेम दिखते नहीं .... पर होते हैं।

कुछ प्रेम दिखते नहीं .... पर होते हैं। सब्र का यह एक कंकड़ उसका दिया हुआ है जिसे डाल कर मैं कब नदी से झील हो गयी मुझे खुद पता नहीं चला। अब शांत हूँ।भंवर अब भी उठते हैं पर धीरे धीरे किनारे लग जाते हैं। हम प्रेम में कुछ कहे बिना भी कितना कुछ कहते हैं ..... प्रेम सुना जाना चाहिए चुपचाप।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें