कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2255

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किसी रोज़ कुछ मिटाना हो मुझसे तो क्या हटाओगे मुझ से

किसी रोज़ कुछ मिटाना हो मुझसे तो क्या हटाओगे मुझ से...... तुम्हारा प्रेम.... तुम हद झुक जाती हो। और बदले में क्या रखना चाहोगे मुझमें? अपना प्रेम तो क्या तुम्हारा प्रेम कम न हो जाएगा मुझसे ? नहीं कल्पना ,मैं तब ख़ाली हो जाऊंगा और तुम मुझे फिर अपने जैसा भर पाओगी। झुका झुका ... तेरे जैसे बन जाएंगे जब इश्क़ हमें हो जाएगा😊😊😊 प्रेम लिख कर पोंछना बहुत आसान है। पोंछ कर लिखना उससे भी आसान।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें