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तस्वीर परसों की है.... उस रोज दक्षु ने अपने लिए पापा से नए…

तस्वीर परसों की है.... उस रोज दक्षु ने अपने लिए पापा से नए जूते ऑनलाइन मंगवाए थे। जूते काले थे तो दक्षु उसके मैचिंग का सब पहन कर फुटबॉल खेलने के लिए शाम को तैयार हो गया। मास्क से लेकर मोजे tshirt घड़ी सब काला।😊😊😊 कहने लगा आज new shoe day है ...इस लिए सब उसके मैचिंग का। मैंने उसे चिढ़ाते हुए कहा इतना बन ठन कर कहाँ जा रहा ? "कुछ तो गड़बड़ है दया" ☺️☺️☺️ मासूम सी शक्ल बना कर बोला इस कोरोना में मुश्किल से तीन चार लड़के मिलरे खेलने वाले ...आप अपनी तिकड़म न चलाओ। ☺️☺️☺️☺️ चाची ने उसे videocall में और चिढ़ा दिया काला कौवा लग रा कोई पूरी खीर न खिला दे तुझे☺️☺️☺️ खेल कर आया तो जूते मिट्टी में सने हुए। मैंने कहा हो गया एक दिन में इनका happy bday। रात 11 बजे स्कूल के काम से निपटी तो बाहर के कमरे में महाराज गीले कपड़े से जूते चमका रहे थे। फिर बाकायदा उसे वापस डिब्बे में रखा गया। मैंने कहा ...इसे सिरहाने रख ले रात को इसी के सपने आएंगे।😊😊😊 बोला माँ आप भी ना too much हो। बच्चे कितने बच्चे रहते हैं ना😊😊😊 अब कुछ दिन काले जूतों से प्रेम चलेगा दक्षु का।फिर मां को ही संभालने पड़ेंगे। *कुछ तो गड़बड़ है दया * उसके और भव्या के बीच का कोड है जो मैंने उसे चिढ़ाने के लिए कह दिया।😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें