कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2188

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तुम कुछ ख़ास नहीं करते लिख कर

तुम कुछ ख़ास नहीं करते लिख कर ... बस अक्षरों की खेती कर कुछ अच्छे मन तैयार करते हो । अक्षरों के काश्तकार बस इस लिए .... पन्नों में दर्ज़ हो जाते हो भूल में नहीं भूख का काश्तकार कहीं दर्ज़ नहीं होता। कहीं भी नहीं.... बंजर मन उगाता जाता है अपनी भूख में मिला कर।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें