कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2149

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दिन के हर सफ़हे को ..... पलट कर देखा

दिन के हर सफ़हे को ..... पलट कर देखा सारी शाम को .....खरोंच कर देखा इस रात को .......उधेड़ कर रख दिया हैरत मैं हूँ … तुम कहीं नहीं मिले नाराज़ हो क्या ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें