भाषा / Language
वो मुझमें रेशम बुनता है
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वो मुझमें रेशम बुनता है ....
ज़रा ज़रा
कभी कभी
इश्क़ का पत्ता जब कभी उसके शहतूत मन पर खिलता है ।😊😊
*मुझे सूखे पत्ते अपनी डायरी और तुम्हारी किताबों के बीच रखने का शौक है।
गुलाब तो यूँ भी सभी रखते होंगे।
फिर मैं तो कल्पना हूँ.....
तुम्हारी कल्पना
Different☺️☺️☺️☺️
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें