कल्पनाशब्दों के बीच
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जिसको बार बार आवाज़ देनी पड़े

जिसको बार बार आवाज़ देनी पड़े.... क्या वाक़ई वो शख्स तुम्हारा है? मैंने उससे पूछा.... इसे ऐसे सोच कर देखो कल्पना... मैं तुम्हारी आवाज़ का मुरीद जो ठहरा. ❤️ उसने कहा कल्पना क्या कहती ...बस इत्र हो कर घुल गयी। * फूल पीठ और चेहरा नहीं पहचानते बस स्पर्श जानते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें