कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2135

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सब कुछ कह गए

*सब कुछ कह गए...... बस दो पूरे इक आधा अक्षर रह गया *भीग जाने के लिए मेरे पास पहाड़ बहुत थे ..... फिर तुम्हारी रेतीली आंखों से मिलना हुआ... *अरे! इतना तो आसान था तुम्हें खुद से जाने देना..... कुछ कागजों को सलवट ही तो देनी थी एक पते को खारिज़ ही तो करना था *मेरे हिस्से का वक़्त कहाँ रखते हो ? देखो तो सही ...... इक समुन्दर उग आया होगा वहां *इसे बस इक इत्तेफ़ाक़ ही समझियेगा.... कि आप चले आये वर्ना..... यहाँ कवायद तो मेरी ख्वाइशों की हो रही थी शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें