कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2055

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तुम जो ये कह देती हो

तुम जो ये कह देती हो ... न कहा करो न मैं कभी कहूँगा हम दोनों दीवार घड़ी में बस साथ टिक टिक सुनेंगे... ये तो ज़ुल्म है ... नहीं मेरी जान..... यही तो इल्म है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें