कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1994

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कभी कविता को कविता से लड़ते देखा है

कभी कविता को कविता से लड़ते देखा है? नहीं तो.... या कहानी को कहानी से जलन करते हुए? नहीं बाबा.... कोई ग़ज़ल देखी है दूसरी ग़ज़ल को बहर से उतारते हुए? उफ्फ़ !नहीं कभी भी नहीं.... अच्छा ! किताब को किताब से तो जरूर देखा होगा बहस करते भिड़ते हुए? क्या बात करते हो यार.....never. फिर ये कौन लोग हैं जो इनको लिख कर आपस में ही धक्का मुक्की कर रहे। लड़ते फिर रहे? सृजनकर्ता😢 #शब्दोंकेखेमे #negativity
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें