कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 1951

भाषा / Language

सबको नाराज़ कर तुझको थामे रखती हूं

सबको नाराज़ कर तुझको थामे रखती हूं ... किसी रोज़ गर मैं नाराज़ हो जाऊं तब तू मुझे कस कर थामें रखना... Dear ज़िन्दगी!💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें