भाषा / Language
पीछे हटने के लिए पल लगते हैं
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पीछे हटने के लिए पल लगते हैं ....
आगे बढ़ने के लिए पुल
कुछ मनमर्ज़ीयाँ की हैं ....
आज कल kc जी की किताब को एक बार फिर पढ़ रही।
इस बार ऐसे पढ़ी।
आड़ी टेढ़ी लकीरें हैं बस...उस पल की😊😊
कविताएं शानदार हैं....हमेशा की तरह।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें