कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1948

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आज अपने मन के चारों खानों को बुहार कर चूने मिट्टी से लीप लि…

आज अपने मन के चारों खानों को बुहार कर चूने मिट्टी से लीप लिया है ।इस उम्मीद में कि किसी रोज़ यूँ ही अचानक तुम मुझ तक पहुंचो या कभी मुझे दस्तक दो तो पनाह दे सकूँ ...छाँव दे सकूँ । एक दिक्कत ये भी है कि तुम्हारे आते ही मेरे लिए जगह ही नहीं बचेगी मेरे ही मन में । मैं नहीं मिलूंगी वहां। मन तुमसे ही भर जाएगा तिल तिल तक । मुझे अदृश्य हो जाना पड़ेगा। मेरे जाने से हुए निर्वात को तुम कल्पना समझ कर अपनी जादूगरी से नया कर जाना । घंटों मुझमें बने रहना। मेरे लीपे हुए में अपनी छुअन के कुछ मनके जरूर बो जाना। तुम्हारे चले जाने के बाद आऊंगी.... अपने ही मन में और चूमती रहूँगी हर ओना कोना महका हुआ । अगली पनाह की आस में ... जो होकर भी नहीं होती।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें