कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1828

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हम पास आते वक़्त कभी नहीं सोचते कि कितनी दूर जाएंगे पर दूर ज…

हम पास आते वक़्त कभी नहीं सोचते कि कितनी दूर जाएंगे पर दूर जाते वक्त इतना जरूर सोचते हैं कि कितना पास आ गये। कल लगा अच्छा ही हुआ पैराशूट के फंदे नहीं खुले और मैं गिर गई। मनपसंद मन पर.....मन की सुनी और मन पर ही मर गई।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें