कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1829

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बेहतरीन यादों को हम अक्सर शीशियों में भर कर कहीं गुम हो जान…

बेहतरीन यादों को हम अक्सर शीशियों में भर कर कहीं गुम हो जाने वाली जगहों पर छोड़ देते हैं । हम क्यूँ डर जाते हैं ? मैंने उससे पूछा... एक साथ दो रूप में चांद कभी नहीं दिखता.... शायद मन भी । वापसी आसान करते हैं बस। अटक तो जाता है मन ....पर ये अटकता नहीं.... उसने कहा। है ना? उसने कहा ....आँखें बंद करो...वो दूर चाँद के पास वाला सितारा नहीं ...मेरी तुम्हारी वाली शीशी है। गुम पर ....दिखती हुई ...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें