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रचना 1814

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हमेशा से मानती हूँ...कि जो भी हमारे करीब आते हैं जरूरी नहीं…

हमेशा से मानती हूँ...कि जो भी हमारे करीब आते हैं जरूरी नहीं हम उनके मन में रहते हैं। अक्सर लोग अपना दिमाग़ लेकर मिलते हैं। कभी पहली मुलाक़ात में कभी कुछ मुलाकातों के बाद यकीनन हम दिमाग वालों को पहचान ही जाते हैं। ये liberty और access का खेल है। इसका संतुलन आपको खुद बनाना होता है। delete बटन पर हमेशा अपना अंगूठा होना चाहिए। कमी हो पर .....कमीने न हों ...होस्टल की ये टैग लाइन हमेशा याद रखती हूं। उसे चुनो... जिसे सुन सकते हो आँखों से बस यही करती हूँ। बुद्ध और बुद्धि का रेला है यहाँ... मुझे बुद्धू ही रहने दो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें