कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1807

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बस अभी पहले दो पन्ने ही छुए हैं... वहीं बस जाने का मन कर रह…

बस अभी पहले दो पन्ने ही छुए हैं... वहीं बस जाने का मन कर रहा।पूरी किताब में जाने कितने नायाब मोती चुन कर रखें होंगे... नमन Geet Chaturvedi जी और दिल से दुआएं...रुख़ के लिए Anurag Vats पढ़ कर मिलती हूँ। मोरपंख और गुलाब से कोमल आपके शब्द...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें