भाषा / Language
दिन भर शब्दों का मौन ढोती हूँ ।
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दिन भर शब्दों का मौन ढोती हूँ ।
फिर देर रात थकान कागज़ पर रख देती हूँ ।
कल्पना का अलाव जलाता है कोई।
सुकून सा लगता है ।
बची खुची राख .... कविता हो जाती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें