कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1808

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दिन भर शब्दों का मौन ढोती हूँ ।

दिन भर शब्दों का मौन ढोती हूँ । फिर देर रात थकान कागज़ पर रख देती हूँ । कल्पना का अलाव जलाता है कोई। सुकून सा लगता है । बची खुची राख .... कविता हो जाती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें