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रचना 1734

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तुम ज़िन्दगी जैसे कभी नहीं चाहिए थे

तुम ज़िन्दगी जैसे कभी नहीं चाहिए थे... तुम मुझे ख़्वाब जैसे चाहिए थे... मेरे इख़्तियार का पैमाना थोड़ा ज़िद्दी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें