भाषा / Language
किसी शहर का ज़ायका देखना हो तो उसकी रात को चख कर देखना चाहिए…
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किसी शहर का ज़ायका देखना हो तो उसकी रात को चख कर देखना चाहिए। कल रात 2 बजे की तस्वीरें हैं।
ये शहर सोता नहीं। आपके साथ कोई चले ना चले रोशनी चलती रहती है। जाने क्यों आप यहाँ नए होकर भी अजनबी नहीं रह पाते। रातें आगोश में और दिन पनाह में लिए लिए फिरते हैं।
अनजाने लोग यूँ ही मुस्कुराते ... जीते... और जिंदगी भाग भाग कर नहीं कैफ़े या बार में खुद को टेक टेक कर चलते हैं। ठहराव एक अलग किस्म का नशा है।
कुछ देर रात रोक लेना या दिन की डोर पकड़ लेना ...फिर छोड़ देना ...अहा 😊😊😊😊
आज यही किया।
रात एक डर ओढ़े रहती है। आज भूल गयी थी शायद डर लपेटना..एक मदहोश अल्हड़ रात में लिपटी कल्पना से मिलना याद रहेगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें