भाषा / Language
जब किवाड़ बंद दिखता है ,तो वो रौशनदान ढूंढती है ।दीवार पर सु…
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जब किवाड़ बंद दिखता है ,तो वो रौशनदान ढूंढती है ।दीवार पर सुराख़ ना मिले तो दरार ढूंढती है।
चाहना तलाशती है इक पल..... इक ज़रिया जो उसे आज़ाद कर दे और उसकी तलाश को क़ैद ।
बहुत जल्दी हार नहीं मानती चाहनायें क्योंकि बंजारन चल तो सकती है.... जल नहीं सकती।
बांझ भी हो जाये मन पर मेरी चाहना का रंग हर बार हरा ही रहेगा ...
कभी हल्का हरा
कभी गहरा हरा भी
इस जीवंत चित्र के लिए Mani Mohan Mehta जी को नमन 💐💐💐💐 कुछ लिखने का प्रयास भर है ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें