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रचना 1497

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कुछ दिनों के लिए इश्क़ की बिनाई रोक रहीं हूँ

कुछ दिनों के लिए इश्क़ की बिनाई रोक रहीं हूँ बस ऐसे ही.... मन किया तो कुछ फंदे गिरा रही हूँ । आगोश बना रहे ... कुछ दिनों के लिए सर्दियाँ मुलतवी कर रहीं हूँ । मिलती हूँ.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें