कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1496

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मैं इस लिए भी उसके सामने रोना नहीं चाहती थी की मुझे पता था…

मैं इस लिए भी उसके सामने रोना नहीं चाहती थी की मुझे पता था कि वो खुद मेरे काँधे पर सिर रख कर समुन्दर हो जाना चाहता था। इतने दिनों बाद मिलो तो शब्द खुल खुल जाते हैं शायद ।अक्षर जोड़ जोड़ कर शब्द बनाने में समय तो लग ही जाता है ।हमारे बीच की चुप्पी शायद इसी वजह थी जो होठों से ज्यादा आंखों में चिपक गयी थी। सुनो ! आज चुप्पी तोड़ने की तुम्हारी बारी है। पिछली फरवरी मैं बोली थी तुमसे....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें