कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1466

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उन दोनों के बीच इश्क़ बचा था या नहीं ये कहा नहीं जा सकता था…

उन दोनों के बीच इश्क़ बचा था या नहीं ये कहा नहीं जा सकता था पर उन दोनों के बीच बहुत सारी ज़िद्द थी। रिश्ता उसी ज़िद्द के सहारे ज़िन्दगी से लिपटा हुआ था। वो अमरबेल से थे ....ज़िद्दी।पीली बेलों में लिपटे हुए अपने प्रेम को सामंजस्य कहना कोई बुरा नहीं। पत्ते हरे कुछ नमी कुछ धूप से ही रहते हैं... ये रिश्ता कायम रखने का मूल मंत्र उन दोनों ने बिन कहे मान लिया था। वो तल्खियाँ ही क्या जो कही न जाएं वो रजामंदी ही क्या जो रही न जाए ज़िद्द बची रहे .... रिश्ते ज़िद्द से चलते हैं । इश्क़ मुहब्बत से तो शहर चलते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें