भाषा / Language
दिल से आभार Ranvijay Rao sir
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दिल से आभार Ranvijay Rao sir ...
आप ने @कल्पना लाइव को इतनी गहराई से देखा । आपके ये शब्द अनमोल हैं मेरे लिए। साथ बना रहे ।ऐसे ही बताते रहें....मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है।
@कल्पना लाइव ranvijay rao sir की नज़र से...
कल्पना का यह पहला काव्य संग्रह है और इस एकमात्र संग्रह से ही उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है।उन्होंने मनुष्य और विशेषकर स्त्री के मन-मस्तिष्क में छिपी अगाध संभावनाओं और उसकी महत्त उदारता को अपनी कविताओं में उद्घाटित किया है।स्त्री के अस्तित्व को कहीं गहरे झांककर उसे महसूसना,उसके स्पंदन को छूने की कोशिश करना,एक सहज, साधारण मानवोचित जीवन को किसी व्यापक/लोकोत्तर सन्दर्भ दृष्टि के साथ देखना-इन बातों की कल्पना की कविताएं तटस्थ भाव से पड़ताल करती हैं।
संग्रह की 'अबोला-प्रेम','मेरी डायरी','मुकम्मल ख्वाइशें','खूबसूरत नहीं हूँ मैं','तन्हाई','रूह का मोती','प्रेम','शब्द...और प्रेम' आदि कविताएं प्रेम पाने को प्रेम जताने के द्वन्द्व की कविताएं हैं। प्रेम वह,जो खुद अपने अलावा दूसरे शरीर का भी प्रतिनिधित्व कर रहा है।ऐसा प्रेम अपने लिए शब्दों को नए सिरे से गढ़ना चाहता है।प्रेम में कहे हर शब्द का एक नया अर्थ है,इसलिए शब्दों को बड़े ही सलीके से कविताओं में पिरोया गया है।
हालांकि कल्पना का यह पहला ही काव्य संग्रह है,पर कविताओं को पढ़ने पर इनकी परिपक्वता साफ झलकती है। वह एक संवेदनशील कवयित्री हैं,इसलिए शायद इनकी कविताएं संवेदनाओं से भरी हैं,आत्मीयता से ओत-प्रोत हैं और कम शब्दों में ही बहुत कुछ कह जाने का सामर्थ्य रखती हैं।
'शब्दों की कॉलोनी','पहाड़ पर उगने वाली रातें','निगोड़े बादल','नदी-सा कर दे' जैसी कई कविताएं कल्पना के काव्य-कौशल की गवाही देती हैं,जो पाठक को भीतर,दूर तक और देर तक विचलित कर देती हैं।प्रेम,परिवेश और घर-संसार को लेकर कवयित्री के सरोकार, फिक्र,संवेदना, समझ,सोच आदि को साफ-साफ जाना-समझा जा सकता है।कविताओं का फलक विराट है तो गहराई और ऊंचाई भी जबरदस्त है। इसमें प्रेम,करुणा और ममता का जो आग्रह है,वह चकित करता है।मौजूदा दौर में मानवीय संबंधों की सूक्ष्मताएं, उनके तमाम ताने-बाने और धागे यहां प्रत्यक्ष हो उठे हैं।
कल्पना जब यह कहती हैं," मैं तो कल्पना हूँ/मुझे बस होने दो," तो कल्पनाओं में होते हुए भी वास्तविकताओं को ओझल नहीं होने देतीं। तथ्यों को गहन और सूक्ष्म अवलोकन कर विशिष्टता और अस्मिता को सार्थक एवं सधे अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं।
अमृता जी को पढ़ने के बाद कल्पना संवेदना से भर जाती हैं।उनसे रहा नहीं जाता और अपनी भावनाओं को शब्दों में गढ़ देती हैं।इसी तरह मक़बूल फ़िदा हुसैन के कैनवास पर भी कल्पना फ़िदा हुए बिना न रहीं-'...हर बार फ़िदा हुए जाती हूँ/खुरचे रंग शर्माए../उड़े और..हुसैन की दाढ़ी में छिप गए।" इसी सन्दर्भ में उनकी 'ड्राइविंग' कविता भी उल्लेखनीय है।इस तरह से कल्पना ने अपनी कविता को सतत विकसित किया है और अपनी भावनाओं को चुनिंदा शब्दों के माध्यम से सजीव किया है।
'औरत','राख','खिड़कियां','परिधि','प्रेम','दंश' आदि संग्रह की छोटी,मगर प्रभावी कविताएं हैं। 'मैं अपने साये में खड़ी हूँ' कविता भी सारगर्भित और समकालीन बोध से संपृक्त है।
इस तरह से कल्पना अपनी कई कविताओं में दुनिया की लौकिकता और भौतिकता की गहमागहमी से परे जाकर देखती हैं।उनकी कई कविताओं में अपने ही ढंग का स्त्री-विमर्श उभरकर आया है।मानवीय संवेदना और प्रेम का रेशा-रेशा ये कविताएं पहचानती हैं।कल्पना की कविताएं भरोसा और उम्मीद जगाती हैं कि अभी बहुत कुछ शेष है।उनकी कविताएं संस्कृति और संवेदना के उद्गार की कविताएं हैं।इसलिए संग्रह की कविताओं के निहितार्थ काफी गहरे और विशद हैं।
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*रणविजय* *राव*
*संपादक*
*लोकसभा* *सचिवालय*
*संसद* *भवन*
*नई* *दिल्ली*
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें