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रचना 1402

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लघु कहानी..... सन्नाटा

लघु कहानी..... सन्नाटा उसे जितना शोर से प्रेम था उतनी ही सन्नाटों से नफ़रत। उसे उजाले पसंद थे .... अंधेरा खुरचना जैसे उसका जुनून। 16 माले पर बनी अपनी बालकनी से वो सुबह सूरज देखा करती थी और पास बनी झुग्गियों में रात। एक रोज़ उसने दिन में तारे इकठ्ठे करने का मन बना लिया। आज उसके पास छोटे बड़े कई तारे हैं जो शोर करते हैं और चमकते भी हैं। झुग्गी के कुछ घर टिमटिमाते हैं। सन्नाटा पोंछ दिया उसने ..... उनका भी और अपना भी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें