कल्पनाशब्दों के बीच
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जाने दीजिए ....मैं धुआँ ही क़ैद करना चाहूंगी ।राख कुछ दिनों…

जाने दीजिए ....मैं धुआँ ही क़ैद करना चाहूंगी ।राख कुछ दिनों बाद चुभने लगेगी। अरे ! आप याद समझ रहे ... मैं तो उस अजनबी की सिगरेट से कह रही थी जो उसकी उंगलियों से जाने कितने बरस के प्रेम में है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें