कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1332

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था ही कहाँ उस रोज़ तुम्हें कुछ देने के लिए

था ही कहाँ उस रोज़ तुम्हें कुछ देने के लिए बोलती ऑंखें.... सिले होंठ क्या देती .... इक तसल्ली थी ......बरसों पुरानी वही दे आयी मैं फिर "नयी " हो आयी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें