कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1289

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प्रेम और दर्द लिख देने भर से हम दुखी आत्माएं नहीं हो जाते

प्रेम और दर्द लिख देने भर से हम दुखी आत्माएं नहीं हो जाते .... हुनर कमाया जाता है । शिद्दत जी जाती है कागज़ पर । तभी चुभन दे पाते हैं । जख्मी ही जख्म दे.... ये कहाँ लिखा है? उफ्फ्फ ... .. दर्द भी है इस बात का और प्रेम तो कत्तई नहीं इस सोच से। कलम अपने तेवर और रंगत बदलती है .... कल्पना नहीं। मुस्कान जी जाती है ... चिपकायी नहीं जाती
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें