भाषा / Language
लौटाना कितना तो आसान है
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लौटाना कितना तो आसान है ...
प्रेम में लिपटे शब्द हों....
या शब्दों में लिपटा प्रेम .....
कुछ यादें कभी नहीं दुखाती ।
वो तो जब हम उन्हें लिखते हैं तो अक्षर बिलखने लगते हैं। लाज़मी हो ही जाता है शब्दों का नम होना
फिर भी देखो...लौटता प्रेम अक्सर कागज़ पर और रूमानी लिखा जाता है ।
यादें बागी नहीं होती ना ... ना ही कलम
साथ रहती हैं...... साथ रहना भी तो प्रेम है।
यादों की सिर्फ एक खासियत है ..... वो चाहे जितने प्रेम बदल ले आंखें नहीं बदल पाती। ढूंढती रहती हैं..
ढूंढ ख़त्म करने के लिए थोड़े होती है। वो सिर्फ लौटते प्रेम को बार बार पहन कर भरम देने के लिए होती है।
शब्दों की मीठी गोलियां ..... तुम्हारे लिए
लौटता प्रेम भी सिर्फ तुम्हारे लिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें