भाषा / Language
हम अलग अलग किताबों के अलग अलग पन्ने हैं ।चाह कर भी मिल नहीं…
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हम अलग अलग किताबों के अलग अलग पन्ने हैं ।चाह कर भी मिल नहीं सकते क्योंकि हमारे बीच बहुत सारे शहर, बहुत सारी ज़िन्दगियाँ ,बहुत सारी सीमाएं ,बहुत सारे सच ,बहुत सारे झूठ ,बहुत सारी चाहनाएँ और सबसे ज्यादा बहुत सारा मन रखा हुआ है ।
अब इतनी सारी दूरी शब्द और मौन के अलावा कोई नहीं पाट सकता। हम भी नहीं।
चलो बारी बारी हम अपने पन्नों में मौन और शब्द की अंताक्षरी खेलते हैं।
किताबें खुश रहें.... बस
क्योंकि....
उदास पन्ने उड़ना जानते हैं।
और मेरा पन्ना तो हार भी नहीं मानता।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें