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कितने मील चल के आता है ....चाँद
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कितने मील चल के आता है ....चाँद
सिर्फ ये जताने के लिए
कि कल की तरह
आज भी चांदनी के
रेशमी रेशे
उसने सिर्फ मेरे लिए ही
बुने हैं .... दिन भर
ढेरों उमींदों के साथ ....
इक अरज़ के साथ ....
कि मैं उसे ओढ़ लूँगी
आज भी ....
अपने रुख पर
और वो बस लिपटके मुझसे
मंद मंद मुस्कुराएगा
आज भी ......
बस दम भर
अनकहा जो बुनता रहा .... दिन भर
चाह कर भी कह न सका ...तिल भर
इसलिए नहीं कि ....कह नहीं सकता
या कहे बिना ......रह नहीं सकता
बल्कि इसलिए कि
उसको ये गुमान है .....
कि वो सिर्फ .....मेरा चाँद है
मेरे रुख से .......रौशन है
ख्वाइशें कातना
उसे भाता है ....
मेरे लिए
कितने मील चल के
वो आता है ....
मेरे लिए
वही रोज़ वाली
रेशमी रेशों वाली
चांदनी लिए
वो रात वाली ओढ़नी लिए
सिर्फ
मेरे रुख के लिए ....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें