भाषा / Language
खुद में घुल जाने का आज बहुत मन था
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खुद में घुल जाने का आज बहुत मन था ....
कमबख्त पहले बारिशें आ गयी
फिर भीगा भागता दुःख चला आया।
नमक की डली कब तक रुकती
घुल गयी
साबुत कुछ न रुका
ना पानी
ना उदासी
ना मन
ना मैं
देख कर बताएं... कुछ घुला क्या
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें