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फिर जब धरा को कुछ न सूझा

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फिर जब धरा को कुछ न सूझा उसने हम पर धूल जमानी शुरू कर दी एक इशारा कि.... तुम पीले पड़ रहे हो अनकही चेतावनी बस मिट्टी पड़ने ही वाली है। धरा माँ है.... हाथ कांप रहे होंगे शायद आज भी ऐसी यवनिका बस इंसान ही रच सकता है निर्माता है ना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें