कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1207

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तिनका तिनका

तिनका तिनका लम्हे बटोर कर इक उम्र चुरा लेती हूँ तब ....जब मैं खुद के लिए लिखती हूँ इक नायाब रिश्ता बोया है मैंने है तो ....... है वाला हूँ तो .....हूँ वाला रिश्ता बस किश्तों में ही पनपता है रोज़ जरा जरा उगता है कोई ख़ास.....खुदगर्ज़ी नहीं बस इक .....इत्मीनान वाला रिश्ता रोज़ इक नयी पत्ती अलफ़ाज़ की खुद में टिका लेती हूँ बीते दिन की पीली पत्ती गिरा लेती हूँ शून्य नाराज़गी ..... शून्य अपेक्षा ....... हाँ तो ........हाँ ना तो ....ना वाला रिश्ता मुकम्मल ना सही पर मुमकिन तो है बस ......यही कहने वाला रिश्ता आईने में उचक उचक कर सिर्फ मुझसे रिश्ता रखने वाला रिश्ता हर दिखावे से परे हर सोच से परे आने जाने वाला रिश्ता कभी कलम में रत्ती भर कभी भर भर .....आकाश वाला रिश्ता
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें