भाषा / Language
हम अक्सर अपने पसंदीदा शब्द दूसरों के पन्ने में देख कर उस कि…
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हम अक्सर अपने पसंदीदा शब्द दूसरों के पन्ने में देख कर उस किताब के प्रेम में पड़ जाते हैं।
खुद को दूसरों की निगाह में खोजना .... एक किस्म की इबादत है ।
ऐसी राह में खुद को छलकाते जाना जिस मिट्टी में फूल, पत्तियां ,शाख ,जड़ सब पराया है ... फिर भी पता नहीं क्या संजोना ....क्या बोना है ? शायद सुकून।
बार बार टूटने और हर बार मुस्कुराने वाला रोग सबको लगे ।
प्रेम लौटे खूब खूब बार ....
जरा सा...सही
आधा अधूरा...सही
टूटा टूटा ही सही ...
एक बून्द भर स्माइली जितना
पर .....हर हाल में उस किताब का पन्ना मेरे अपने चुप प्रेम को सींचता रहे।
चाहा बस यही चाहा ...
यही चाहना कायम रहे।
पाना नहीं ....संजोना सीखा है तुमसे ।
पन्ना- पन्ना
शब्द - शब्द
मैं-मैं
तुम-तुम
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें