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रचना 0964

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कौन कहता है निर्वात से कुछ लिखा नहीं जा सकता

कौन कहता है निर्वात से कुछ लिखा नहीं जा सकता? देखो मैंने अभी अभी लिखा............. "फ़ासले " मेरी खिड़की पर बैरी चाँद आज बड़े दिनों बाद टिका है। प्रेम झिड़की तो बनती है। 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें