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रचना 0962

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नज़दीकियों और दूरियों के दरमियाँ

नज़दीकियों और दूरियों के दरमियाँ "जगह" का कोई किरदार नहीं होता बस ....इक "वजह" होती है जो बेबाक बोलती हुई प्रेम को स्थापित....... विस्थापित करती रहती है बड़ी ख़ामोशी से .....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें