भाषा / Language
अपने अंतस के सामने दाने डालना छोड़ दो
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अपने अंतस के सामने दाने डालना छोड़ दो ....
एक पासा आसमान को उछालो
इस बार बारिशें इंतज़ार में हैं तुम्हारी
ओस की माला ....
वो बून्द का ग़ज़रा पहन कर देखो तो सही कल्पना
तुम्हारी सादगी कविता होना सीख रही
लिखती रहो
शब्द इश्क़ में ढल रहे
कलम मुस्कुरा रही...
नज़्म होने को है।
कोई देखे ना देखे.....
खुद से बातें करते रहना ...बातें करते रहना
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें