कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0871

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जब रूहें बंधती हैं तो शब्द डोर खुलती जाती है

जब रूहें बंधती हैं तो शब्द डोर खुलती जाती है... उस मखमल में मौन भी नहीं ठहरता।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें