जब रूहें बंधती हैं तो शब्द डोर खुलती जाती है... उस मखमल में मौन भी नहीं ठहरता।
रचना 087110 अगस्त 2017भाषा / Languageहिन्दीEnglishजब रूहें बंधती हैं तो शब्द डोर खुलती जाती है✦जब रूहें बंधती हैं तो शब्द डोर खुलती जाती है... उस मखमल में मौन भी नहीं ठहरता।कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें