भाषा / Language
जब कभी ख्वाइशें
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जब कभी ख्वाइशें
बहुत दूर तलक चल कर भी हाथ से फिसल जाएँ ....
तो समझ लीजिये
जीत आँखों ने तो चख ली
पर मन ......अभी और कसौटियां चखना चाहता है
अपनी पहचान .......परखना चाहता है
कुछ हैं अब तलक.... जो कम है मुझमें
कुछ है अब तलक.... जो नम है मुझमें
इस बार फिर .....
इक बार और ......चला जाये
इस बार कुछ बेहतर...ढला जाए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें