भाषा / Language
तुम्हारे शब्दों के भंवर में अपने लिए मोड़ क्यों ढूंढती हूँ मैं
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तुम्हारे शब्दों के भंवर में अपने लिए मोड़ क्यों ढूंढती हूँ मैं?
रोज़ की ये एक सी ज़िद्द ......ये एक सी उमींद ।
उफ्फ्फ्फ्फ..... मानो कल्पना !
चाँद हो या सूरज टुकड़ों में बंटा हुआ रोशनी नहीं देगा तुम्हें ।आखरी फांक कब तक ताकती रहोगी तुम?
हजार राहें एक तरफ अगर जाती हों तो तुम कहीं नहीं पहुंच रहीं।
रुक जाओ .... भरम सूख जाने दो।
हद्द है यार... तुम अब भी मुस्कुरा रही ..
तुम्हें धड़कना कितना पसंद है.....कल्पना !
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें