कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
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रचना 0847

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अभी शब्दों की आंच से ही नहीं उबर पाए थे हम

अभी शब्दों की आंच से ही नहीं उबर पाए थे हम.... तुमने तस्वीर का तिलिस्म हथेलियों पर धर दिया। अंतस मखमल करने का शुक्रिया ...... इतना सारा इत्र घोल देने का शुक्रिया ..... 😊😊😊😊याद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें