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रचना 0838

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तुम्हारा भरम रखे रहना चाहती हूं

तुम्हारा भरम रखे रहना चाहती हूं.... चाक ढूंढ रही जो तुम्हें हूबहू गढ़ सके मेरे लिए । खुशबू मैं खुद भर लूँगी । भरम मेरा तो खुशबू भी मेरी ही रहेगी ना। तुम्हारा होना लाजमी नहीं.... तो ना सही। खुशियां बहाने से नहीं..... लाने से आती हैं। मैं भरम पालने में माहिर हूँ। 😊😊😊😊😊 याद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें